भारत की अर्थव्यवस्था में मजबूती बरकरार, लेकिन वैश्विक चुनौतियों के बीच सतर्क रहने की जरूरत: वित्त मंत्रालय

भारत की अर्थव्यवस्था में मजबूती बरकरार, लेकिन वैश्विक चुनौतियों के बीच सतर्क रहने की जरूरत: वित्त मंत्रालय

नई दिल्ली । वित्त मंत्रालय ने जारी अपनी ‘मंथली इकोनॉमिक रिव्यू’ में कहा कि मई में भारत की व्यापक आर्थिक (मैक्रोइकोनॉमिक) स्थिति सतर्क लेकिन मजबूत बनी हुई है। मजबूत सेवा निर्यात, पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार और स्थिर श्रम बाजार ने अर्थव्यवस्था को सहारा दिया है। हालांकि, रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक स्तर पर ऊर्जा की ऊंची कीमतें, रुपए में कमजोरी, उत्पादन लागत में बढ़ता दबाव और सामान्य से कम मानसून की संभावना ऐसे कारक हैं, जिनके चलते नीति निर्माताओं को लगातार सतर्क रहने की आवश्यकता होगी। आर्थिक समीक्षा में कहा गया, “वित्त वर्ष 2026-27 में विकास की रफ्तार बनाए रखने और महंगाई को नियंत्रित रखने के लिए मौद्रिक, राजकोषीय और संरचनात्मक नीतियों में लचीलापन और सक्रियता जरूरी होगी, क्योंकि वैश्विक माहौल अभी भी अनिश्चित बना हुआ है।”
रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष पहले से कमजोर वैश्विक आर्थिक सुधार के लिए एक बड़ा झटका बनकर उभरा है। इसका असर ऊर्जा बाजार, सप्लाई चेन, व्यापार मार्गों और वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों पर साफ दिखाई देने लगा है।
ऊर्जा, परिवहन और लॉजिस्टिक्स लागत में वृद्धि के कारण महंगाई का दबाव फिर बढ़ा है, और कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में ‘स्टैगफ्लेशन’ (कम विकास और ऊंची महंगाई) की चिंताएं दोबारा उभरने लगी हैं।
समीक्षा में कहा गया है कि यदि खाड़ी क्षेत्र से ऊर्जा आपूर्ति में लंबे समय तक व्यवधान बना रहता है, तो इससे वैश्विक आर्थिक विकास और कमजोर हो सकता है तथा कई देशों की आर्थिक चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
भारत के लिए भी इन बाहरी दबावों का असर अब धीरे-धीरे घरेलू अर्थव्यवस्था में दिखाई देने लगा है।
रिपोर्ट में कहा गया, “अप्रैल 2026 में भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपनी विकास गति बनाए रखी। ई-वे बिल जनरेशन, पीएमआई सूचकांक और बिजली खपत वृद्धि के दायरे में बने रहे। हालांकि, आठ प्रमुख उद्योगों के सूचकांक और ईंधन खपत में नरमी यह संकेत देती है कि वैश्विक चुनौतियों का असर घरेलू अर्थव्यवस्था के कुछ क्षेत्रों पर पड़ने लगा है।”
अप्रैल 2026 के महंगाई आंकड़ों का जिक्र करते हुए समीक्षा में कहा गया कि उपभोक्ता महंगाई और थोक महंगाई के बीच अंतर बढ़ता दिखाई दे रहा है।
खुदरा महंगाई (सीपीआई) मामूली बढ़कर 3.48 प्रतिशत रही और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के लक्ष्य से नीचे बनी रही। हालांकि, कुछ खाद्य पदार्थों और रेस्तरां तथा आवास जैसी सेवाओं में कीमतों का दबाव बढ़ा है।
दूसरी ओर, थोक महंगाई (डब्ल्यूपीआई) तेजी से बढ़कर 8.3 प्रतिशत पर पहुंच गई, जिसका मुख्य कारण वैश्विक ऊर्जा कीमतों में उछाल, रुपए की कमजोरी और कम बेस इफेक्ट रहा।
रिपोर्ट के अनुसार, थोक स्तर पर बढ़ती कीमतों और हाल में ईंधन की कीमतों में हुई वृद्धि का असर आने वाले महीनों में परिवहन, ऊर्जा और खाद्य पदार्थों के जरिए खुदरा महंगाई पर भी पड़ सकता है।
इन अल्पकालिक जोखिमों के बीच भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने इस साल मानसून को दीर्घकालिक औसत (एलपीए) का लगभग 92 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है।
समीक्षा में कहा गया कि देश के पास 817.53 लाख टन चावल और गेहूं का बफर स्टॉक मौजूद है तथा जलाशयों में भी पर्याप्त जल भंडारण है, जिससे खाद्यान्न सुरक्षा को सहारा मिलेगा।
हालांकि, यदि वर्षा में बड़ी कमी रहती है और मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियां बनी रहती हैं, तो खाद्य महंगाई बढ़ सकती है, ग्रामीण मांग कमजोर हो सकती है और समग्र आर्थिक विकास पर असर पड़ सकता है।
अप्रैल 2026 में औद्योगिक गतिविधियों में कुछ नरमी देखी गई, जिसका कारण वैश्विक अनिश्चितता और हाइड्रोकार्बन क्षेत्र की कमजोरी रही।
फिर भी सीमेंट, स्टील और बिजली उत्पादन में मजबूती बनी रही, जो बुनियादी ढांचे और निर्माण गतिविधियों से जुड़े मजबूत घरेलू मांग को दर्शाती है।
एचएसबीसी इंडिया मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई भी विस्तार के दायरे में बना रहा, हालांकि बढ़ती उत्पादन लागत ने कारोबारी परिस्थितियों पर दबाव डाला।
रिपोर्ट में कहा गया कि निर्यात ऑर्डर में बढ़ोतरी, रोजगार के अवसरों में वृद्धि और ऑटोमोबाइल, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स तथा रक्षा विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में लगातार निवेश यह संकेत देते हैं कि औद्योगिक गतिविधियों में बुनियादी मजबूती बनी हुई है।
वित्तीय क्षेत्र की बात करें तो विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) की निकासी के कारण पूंजी प्रवाह में अस्थिरता बनी रही और रुपए पर दबाव देखा गया।
इसके बावजूद, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) का प्रवाह मजबूत रहा और वित्त वर्ष 2025-26 में यह रिकॉर्ड 94.5 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया, जो भारतीय अर्थव्यवस्था में दीर्घकालिक निवेशकों के भरोसे को दर्शाता है।
साथ ही विदेशी मुद्रा भंडार भी आरामदायक स्तर पर बना हुआ है, जो वैश्विक अस्थिरता से निपटने के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच का काम कर रहा है।
रिपोर्ट में कहा गया कि श्रम बाजार के संकेतक भी सकारात्मक हैं। रोजगार और श्रम भागीदारी दर स्थिर बनी हुई है, जबकि विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों में भर्ती गतिविधियों में निरंतर मजबूती देखी जा रही है।

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